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26 May 2008

बीड़ी - एक परिचय (Beedi factsheet)

बीड़ी - एक परिचय

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बीड़ी के रूप में सबसे अधिक धूम्रपान भारत में होता है। बीड़ी जिसको कि तेंदू के पत्ते में लपेटकर बनाया जाता है पूरी तरह से तम्बाकू से भरी हुई होती है।

बीड़ी का प्रयोग वैसे तो मुख्यतः आदमियों के द्वारा किया जाता है लेकिन इसको बनाने में महिलाओं और बच्चों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है जो बीड़ी को अपने घरों में बनाते हैं। सिगरेट के मुकाबले बीड़ी की बिक्री करीब ८:१ की है । यानि कि प्रत्येक ८ बीड़ी पर १ सिगरेट की बिक्री होती है।


अत्यन्त घातक है बीड़ी का पीना : -

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- बीड़ी पीने से लोगों में तपेदिक या टी०बी०, साँस की बीमारी इत्यादि में बढ़ोतरी देखी गई है। ।

- बंगलोर में किए गए एक शोध के द्वारा पता चलता है कि प्रतिदिन १० बीड़ी पीने वाले व्यक्ति को करीब चार गुणा ह्रदय के रोग का खतरा ज्यादा रहता है सामान्यत: ऐसे लोगों को जो कि बीड़ी का उपयोग नही करते हैं।

- भारत में किए गए शोध के द्वारा भी इस बात का पता चलता है कि बीड़ी पीने वाले लोगों में फेफड़े के कैंसर के होने का खतरा करीब ६ गुणा ज्यादा रहता है उन लोगों की तुलना में जो कि बीड़ी का उपयोग नही करते हैं।

- तमिलनाडु में किए गए शोध के द्वारा यह बात निकल कर आई कि ग्रामीण छेत्रों में रहने वाले ४७% पुरुषों की मौत जो कि तपेदिक की बीमारी से भी ग्रसित थे , बीड़ी पीने की वजह से हुई।- मुम्बई में किए गए शोध के द्वारा भी इस बात का पता चलता है कि ऐसे लोग जो कि बीड़ी का सेवन करतें हैं उनमें मौत की सम्भावना करीब ६४ % अधिक रहती है उन लोगों की तुलना में जो कि इसका उपयोग नही करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोगों में भी जो कि अनुमानतः करीब ५ बीड़ी का सेवन प्रतिदिन करतें हैं उनमे इसके द्वारा होने वाली मौत की सम्भावना करीब ४२ प्रतिशत अधिक होती है।

- बीड़ी का सेवन करने वाले लोग कार्बन मोनोआक्साइड और निकोटीन आदि को ज्यादा ग्रसित करते हैं उन लोगों की तुलना में जो सिगरेट का सेवन करते हैं। इसलिये बीड़ी या तो ज्यादा या कम-से-कम सिगरेट के बराबर तो खतरनाक है ही।

- तम्बाकू की खेती और इसके पत्ते से बीड़ी बनाने के व्यवसाय में लगे हुए लोगों और उनके परिवारों को इससे काफी खतरा है ।

- शोधों से पता चलता है कि जो लोग बीड़ी के पत्ते की कटाई के काम में लगे हुए हैं उनके पेशाब में निकोटीन की मात्र पायी गई है। लगातार इस काम में बने रहने से बीड़ी मजदूरों में इस बात की भी सम्भावना बढ़ जाती है कि वह इस नशे के आदि हो जायें।

- ऐसे लोग जो बीड़ी के पत्तों को लपेटने का काम करतें हैं उनमें तपेदिक, अस्थमा, एनीमिया, आंखों की समस्याएँ तथा महिलाओं में स्त्री रोग से संबंधित समस्याएँ आ सकती हैं।

- बीड़ी को घरों में रखने से उनमे रहने वाले लोगों में खाँसने और सरदर्द की बीमारी शुरू हो जाती है।

- बीड़ी के पत्तों को लपेटने के काम में लगे हुए लोग गरीबी की तरफ़ और बढ़ते जाते हैं।

- राज्य सरकारों द्वारा बीड़ी के लपेटने के काम में लगे हुए लोगों के लिए जो कीमतें निर्धारित की गई है वह प्रति १००० बीड़ी लपेटने पर उत्तर प्रदेश में २९ रूपये और गुजरात में ६६.८ रूपये निर्धारित है।

- लगातार बीड़ी के काम में लगे हुए लोगों में करीब ४५ साल की उम्र तक उनके हाथों के उँगलियों की ऊपरी सतह की खाल मर जाती हैं और वह काम करना बंद कर देती हैं। इस परिस्थिति में वह लोग जो बीड़ी बनाने का काम नही कर पाते भीख मांगने का काम तक शुरू करne के लिए विवश हो जाते हैं।

- बीड़ी उत्पादन का सबसे मुख्य भार महिलायें और बच्चे उठाते हैं।- करीब २२५,००० बच्चे बीड़ी बनाने के काम में लगे हुए हैं ।

- करीब ७६ से ९५ % महिलाओं को बीड़ी बनाने से रोजगार प्रदान होता है।

- वह महिलाएं जो कि बीड़ी के पत्ते बनाने के काम में लगी हैं वह शारीरिक और अभद्र बातों से भी ज्यादा प्रताड़ित होती हैं।


भारत में बीड़ी पर उत्पाद कर की व्यवस्था, सार और कुछ सुझाव :
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सुझाव देने से पहले हम बीड़ी और सिगरेट इत्यादि पर लागू उसके ऊपर उत्पाद कर और उसके प्रावधानों के बारे में तथ्य जान लें।

- बीड़ी के लिए उत्पाद शुल्क का निर्धारण प्रत्येक १००० बीड़ी के ऊपर किया जाता है। इसमे भी इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि वह बीड़ी हाथ द्वारा बनी हुई है या फिर मशीन के द्वारा। ज्ञात हो कि करीब ९८ % बीड़ी हाथ द्वारा ही बनी होती है।

- यदि एक साल में बीड़ी उत्पादनकर्ता २० लाख से कम बीड़ी का उत्पादन बिना मशीन की सहायता से करता है तो ऐसे में वह कर से मुक्त होता है।

- २० लाख से अधिक बीड़ी बनाने की लिए हर साल सिर्फ़ ६ मजदूरों की जरुरत होती है। औसतन १००० बीड़ी प्रतिदिन इन मजदूरों द्वारा बनाई जाती है।


- हाथ द्वारा निर्मित बीड़ी पर आबकारी शुल्क वर्ष २००६/०७ में करीबन ३३ प्रतिशत बढ़ा और वर्ष २००७/ ०६ में यह शुल्क १६ % और बढ़ा दिया गया।


- वर्ष १९९३ / ९४ और २००६/०७ के मध्य सिगरेट की तुलना में बीड़ी के उत्पाद से प्राप्त आबकारी राजस्व में गिरावट आई है।

- आबकारी शुल्क प्रत्येक १००० बीड़ी पर १८ रूपये है। वहीं बिना फिल्टर वाली छोटी सिगरेट पर आबकारी शुल्क प्रति १००० सिगरेट पर १६८ रूपये है।

- आम फिल्टर युक्त सिगरेट की तुलना में बिना फिल्टर वाली छोटी सिगरेट पर आबकारी शुल्क २१ प्रतिशत है।

- यदि हम खुदरा मूल्य के तहत आबकारी शुल्क को देखें तो पातें हैं कि यह शुल्क हाथ द्वारा निर्मित बीड़ी पर ८.८% है। जबकि सिगरेट पर यह बोझ ३३ % से भी अधिक है।

- यद्यपि इस बात का कोई पर्याप्त आंकड़ा मौजूद नही है कि कितनी बीड़ी का उत्पादन हर साल किया जाता है, किंतु एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक वर्ष करीब ७५० अरब से १.२ खरब तक की बीड़ी का उत्पादन प्रत्येक वर्ष भारत में होता है। जिसमें से वर्ष २००६ / ०७ में लगभग ३६० अरब बीड़ी के उत्पादन पर ही आबकारी शुल्क वसूल किया गया था। इससे स्पस्ट है कि लगभग आधे बीडी के उत्पाद पूर्णतः आबकारी कर से मुक्त थे।

- बीड़ी पर लागू आबकारी शुल्क को किसी सिगरेट के आबकारी शुल्क से अलग नही किया जा सकता खास कर उन सिगरेटों पर जो कि फिल्टर रहित होती हैं और बीड़ी के मुकाबले ही बिकती हैं।

वर्ष १९९४/९५ में बिना फिल्टर वाली सिगरेटों पर आबकारी शुल्क कम कर दिया गया और बीड़ी के कर में वृद्धि कर दी गई थी इससे पाया गया कि आचानक बिना फिल्टर वाली सिगरेटों में गिरावट आई थी। जब बिना फिल्टर वाली छोटी सिगरेटों पर उत्पाद शुल्क बढ़ा तो पाया गया कि इसकी बिक्री में गिरावट दर्ज हुई है। जबकि बीडी की बिक्री में बढोतरी दर्ज हुई है।


सुझाव
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हाथ द्वारा बनाई हुई बीड़ी और मशीन द्वारा बनाई गई बीड़ी के अन्तर को ख़त्म करना चाहिए ।

- बीड़ी पर भी गैर फिल्टर आधारित सिगरेटों की तरह ही उत्पाद कर लगाना चाहिए जो कम से कम १६८ रूपये प्रति १००० बीड़ी होना चाहिए। यदि ऐसा किया गया तो बीड़ी की कीमत प्रति पैकट जिसमे कि करीब २५ बीड़ी होती है, ४ से ८ रूपये बढ़ जायेगी ।

- इस बात की गारंटी प्रदान करना कि भले ही बीड़ी का उत्पादन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हो रहा हो, उन सभी पर बराबर उत्पाद कर लगेगा तथा समुचित प्राधिकारी द्वारा बीड़ी उद्योंगों की पर्याप्त मानकों के आधार पर नियमित जाँच भी होगी।

- बिना ब्राण्ड के किसी भी बीड़ी उत्पाद की बिक्री बाज़ार में नही होनी चाहिए और ब्राण्ड का नाम बिक्री के पैकेट के ऊपर लिखा होना चाहिए।

- उत्पादनकर्ताओं और उनके एजेंटों द्वारा जितनी भी बीड़ी की बिक्री की गई है उसकी पर्याप्त जानकारी सरकार को मिलनी चाहिए।


राष्ट्रीय स्तर पर लागू जि० एस० टी ० तम्बाकू उत्पाद के करों को आसानी से प्रोत्साहन निम्न माध्यमो द्वारा करेगा:-

- राष्ट्रीय स्तर पर लागू जि० एस० टी० मानकों के अनुसार उत्पाद कर भी उसी तरह से लिया जाना चाहिए जिस तरह से अन्य सामानों का लिया जाता है ।

- प्रत्येक सिगरेट के उत्पाद पर बराबर उत्पाद शुल्क होना चाहिए।


भारत में बीड़ी उद्योग की स्तिथि :--

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भारत सरकार ने बीड़ी उद्योगों में काम कर रहे मजदूरों के कल्याण और उनको सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ अधिनियम और नीतियाँ बनाई हैं । किंतु सच्चाई तो यह है कि वास्तव में इन नीतियों से अभी तक किसी भी तरह का लाभ इन मजदूरों को नही मिला है।

भारत में बीड़ी उद्योग का स्वरूप :-

- भारत में करीब ३०० बड़े उद्योग बीड़ी बनाने के काम में लगे हैं और कई हज़ार अन्य छोटे उद्योग भी इसके काम में लगे हुए हैं।

- बीड़ी उद्योग करीब ४४ लाख लोगों को सीधे तौर पर पूर्णकालिक रोजगार प्रदान करता है और करीब ४० लाख बीड़ी बनाने के अन्य कामों में लगे हुए हैं।

- भारत के बीड़ी उद्योग से वर्ष १९९९ में करीब १६५ अरब उत्पाद कर और २० अरब विदेशी बिनिमय भारत सरकार को प्राप्त हुआ है।


- मुख्य अधिनियम जो बीड़ी मजदूरों के लिए बनाये गए हैं:

१ - बंधुआ मजदूर मुक्ति करण अधिनियम , १९७६, यह अधिनियम बंधुआ मजदूरी को रोकता है।
२- बाल मजदूर रोक्धाम अधिनियम १९८६, इस अधिनियम के तहत अव्यसक बच्चों को बीड़ी के बनाने के किसी भी काम में लगाना जुर्म है।


बीड़ी मजदूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएं :-

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बीड़ी मजदूर कल्याणकारी फण्ड १९७६, इस फण्ड के तहत बीड़ी उद्योगों में काम कर रहे मजदूरों को शिक्षा, चिकित्सा, बीमा योजना , घर का किराया इत्यादि प्रदान किया जाएगा।

- काम के दौरान बीमा योजना :- इस योजना के तहत काम के दौरान बीड़ी मजदूर को यदि किसी प्रकार की समस्या आती है तो उसको आर्थिक सहायता प्रदान की जायेगी।

इन कल्याणकारी योजनायें और अधिनियमों के बावजूद सच तो यह है कि कुल बीड़ी मजदूरों में से १५ से २० % बच्चे शामिल हैं। बीड़ी मजदूरों के पास किसी भी प्रकार का कोई पहचान पत्र नही है। कई शोधों द्वारा यह बात पता चलती है कि बीड़ी बनाने के काम में लगी करीब ५० % महिलाएं कई तरह की सामाजिक दिक्कतों का सामना करती हैं।

पिछले कुछ सालों में बीड़ी व्यवसाय का काम कर रहे लोगों ने बीड़ी उत्पाद का काम बीड़ी कारखानों के बजाये लोगों के घरो में स्थानांतरित कर दिया है। क्योंकि इन बीड़ी उद्योग के मालिकों को इस बात का डर है की कहीं यह बीड़ी मजदूर कोई संगठन न बना लें। दक्षिण भारतीय राज्यों में कराये गए एक शोध में पाया गया कि केवल ४४% बीड़ी मजदूर पंजीकृत थे , ५०% बीड़ी मजदूरों के पास पहचान पत्र था और मात्र ९% बीड़ी मजदूर व्यापार संघ के सदस्य थे। कई ऐसे मजदूर थे जिनके पूरे परिवार बीड़ी बनाने में लगे हुए थे परन्तु सिर्फ़ एक के पास ही पहचान पत्र था।


बीड़ी मजदूर और उनकी आजीविका :-

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बीड़ी लपेटने का सारा काम मुख्यतः आदमिओं द्वारा संचालित किया जाता है , और इस काम में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल होते हैं जो कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करतें हैं।

- बीड़ी उद्योग में काम कर रहे कुल मजदूरों में से करीब ७५% हिस्सा महिलाओं का होता है। किंतु बीड़ी उद्योग मुख्यतः पुरुषों द्वारा संचालित किया जाता है। अखिल भारतीय बीड़ी, सिगार, तथा तम्बाकू मजदूर संघ के अनुमान के मुताबिक ९५% महिलाएं बीड़ी उद्योग में काम कर रहीं हैं।

- प्राथमिक स्तर पर बीड़ी लपेटने का काम महिलाओ द्वारा किया जाता है और यह काम मुख्यतः वह अपने घरों द्वारा संचालित करती हैं जिससे उनका पूरा परिवार ही इस काम में शामिल हो सके।

- एक अनुमान के मुताबिक बीड़ी उद्योग के काम में लगे करीब १६ % बच्चे ऐसे होते हैं जिनकी उम्र १४ साल से कम की होती हैमुख्यतः यह बच्चे सप्ताह के दिन और करीब १४ घंटे प्रतिदिन काम करते हैं। किंतु गैर सरकारी संगठनों का यह मानना है कि यह आंकड़ा बिल्कुल ग़लत है।

- बीड़ी लपेटने के काम में यह बच्चे किसी भी तरह के दास्ताने और मास्क आदि का प्रयोग नही करते हैं जिसके कारणवश काम के वक्त उनके शरीर में तम्बाकू आदि के कण प्रवेश कर जाते हैं।

एक खतरनाक व्यवसाय :-

बीड़ी उद्योग में काम कर रहे मजदूरों को कई तरह की खतरनाक बीमारियाँ होने का डर रहता है जैसे साँस की बीमारी आदि।

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भारत तथा विश्व स्तर पर तम्बाकू की जानकारी प्राप्त करने के लिए डाऊनलोड करें:-

- हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित वैश्विक तम्बाकू महामारी की रिपोर्ट और एम् - पॉवर पैकेज को डाऊनलोड करने के लिए यहाँ पर क्लिक्क कीजिये:

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भारत में तम्बाकू नियंत्रण जो की भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट को डाऊनलोड करने के लिए यहाँ पर क्लिक्क कीजिये


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